किसे कहते हैं कला? क्या हैं सौंदर्य ?शब्दों में पारिभाषित करने से ज्यादा यह एहसास में अभिव्यक्त होता हैं । दो युवा कलाकारों की कृतियों के बहाने कला , सौंदर्य और विचार पर एक राय ।
शिल्पा की स्त्रियों को देखना एक विचारोत्तेजक अनुभव है । बकौल शिल्पा राजनीतिक विषयों को आतंरिक तर्क संगति देना व उसको कलात्मक(?) आवरण देकर विचार संघर्ष की एक नई दुनिया में ले जाना ही दरअसल शिल्पा के सृजन के फलितार्थ हैं ।
शिल्पा मुंबई जैसे महानगर में पलीबढी है । शहरी जीवन के विविध आयाम, महानगरों पर आतंक की छाया ,सांप्रदायिक दंगे आदि का एक नागरिक की तरह सामना करती रही हैं। '१०० क्यू' ऐसे ही महानगरीय जीवन के संघर्ष और सम्भावनाओ के क्षितिज को दर्शानेवाले इंस्टालेशन है । शिल्पा साऊंड (ध्वनि) को लेकर काफी सचेत रही हैं । उन्होंने विभिन्न जगहों पर जाकर यथा सुरक्षा गार्ड के इर्द-गिर्द की ध्वनि को रिकार्ड करना, उनकी चक्राकार अभिव्यक्ति, यहाँ तक की इसके लिए रोबोट का उपयोग कर, शिल्पा ने शहरी जीवन के शोर को अभिव्यक्त किया है। इसी इंस्टालेशन का एक भाग जय बृहद फोटो जिसमे समुद्र है, खुला आसमान है जो सम्भावनाओ को अभिव्यक्त तो करता है , पर कला कहाँ है ?
शिल्पा को आतंक ने गहरे तक प्रभावित किया है। यह उनके 'देयर इज नो एक्सप्लोसिव इन दिस ' प्रयोग में दीखता है। शिल्पा ने १०० बैग जिन पर उक्त वक्तव्य लिखा था, को लन्दन के एक कमरे में रखा। १०० आगन्तुकों को उन्हें 'पब्लिक प्लेस' पर ले जाने का अनुरोध किया गयाफ़िर उन्हें 'डाक्यूमेंट' किया। पर प्रश्न है की कला कहाँ है ?
शिल्पा को जम्मू-कश्मीर की एक यात्रा ने इस कदर आक्रांत किया की उनको अभिव्यक्त होना ही था। अभिव्यक्त इंस्टालेशन के रूप में है और तीन भागो में है। पहले हिस्से में विधवा कश्मीरी औरतो के सफेद कपडे अलगनियों पर इस तरह से टंगे है मानो डार्क रूम में निगेतिव्स । सफेद कपरे पर एल सी डी प्रोजेक्टर से अस्पष्ट बनती बिगड़ती रेखाओं का प्रक्षेपण दर्शको से संवाद बनाने में असफल प्रतीत होता है। दूसरा इंस्टालेशन सफेद बोर्ड पर एक खत-दो -खत खेलती लडकी व् तीसरा एक विडियो का प्रदर्शन, जिसमे एक सफेद कपडे पहने लडकी के अस्पष्ट भाषण हैं। कोई चाक्षुष बिम्ब नही बनता है अथवा सौन्दय बोध नही होता है , कहने को तो ये असंवाद से संवाद बनाते है , क्या यह वस्तुगत आयाम से विचारगत आयाम में प्रस्थान का आरम्भ है? अगर हाँ तो क्या यह कश्मीर जैसे गंभीर मसले का अत्यन्त सरलीकरण नही है? अगर है भी, तो कला कहाँ है ?
शिल्पा ने महाभारत की तलाश में कुरुक्षेत्र की यात्रा की । पर हासिल कुछ नही हुआ। क्योकि यह वैज्ञानिक व् पुरातात्त्विक प्रगति के विषय हैं , कलात्मक अन्वेषण मात्र से हासिल नही किया जा सकता है। 'लुकिंग फॉर कुरुक्षेत्र' एक अत्यन्त साधारण फोटोग्राफ है और १०० हैड द्रण, मैप्स ऑफ़ इंडिया' अत्यन्त ही सामान्य स्लाइड प्रेजेटेशन। यहाँ पुनः प्रश्न है की कला कहाँ है? इसी प्रकार कुछ बच्चो की तस्वीर हैं , जिनसे बात की गई है उन्हें हेडफोन के जरिये आप सुन सकते हैं पर सौंदर्य कहा है ।
शिल्पा भारत पाक विभाजन के बाद नेहरू व् जिन्ना के पहले भाषण की रिकाडिंग प्रस्तुत करती है। दो माक्रोफोन एक कमरे के एकांत में संवाद स्थापित करते। पर शिल्पा का उद्देश्य अस्पष्ट सा रहता है। एक बात जो समझ में आती है की ध्वनी से, फोटो से, इतिहास से, भूगोल से लगाव है शिल्पा को, पर इस लगाव का कलात्मक रूपांतरण होना शायद अभी शेष है।
समकालीन चाक्षुष कला की दुनिया में जो कुछ घटित हो रहा है वह काफी अन्तर्विरोध भरा, परमुखापेक्षी है जिसमे इनका विस्थापन कलात्मक मूल्यों से हुआ है। शिल्पा के इंस्टालेशन को देखते हुए जो प्रश्न सहज उठते हैं क्या कला महज सौन्दर्यबोध की तलाश है या कोई गंभीर बौद्धिक कार्य है या जीवन व् जीवन से इतर (जैसा की कदिन्सकी ने आधुनिक कलाओं के लिए अनिवार्य माना था) विभिन्न अनुभवो को महसूस करने का एक सहज तरीका है। अभी हाल में एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक ने रंगकर्मियों को विद्वान मानने पर ही प्रश्न चिह्न खरा कर दिया। तो क्या कला कर्म bauddhik कर्म नही है और अगर है तो क्या उसका दायित्व मात्र इतना है की वह गंभीर विषयों को महज विषय मानकर सरलीकृत कर दर्शको के समक्ष प्रस्तुत कर दे। इंस्टालेशन व् कला के नम पर आज अधिकतर तथाकथित सृजन कार्य स्वयं को धोखे में रखने व् दूसरो को धोखे देने का प्रयास मात्र है। इंस्टालेशन कहा तक विचार है और कहा से वह कला है, यह कहना मुश्किल है पर किसी भी गंभीर विषय पर रचनाकर्म को एक कलाकृति होने के लिए सौन्दर्य के आग्रह से नही रोका जा सकता है। यह सच है की कला और ज्ञान के बीच संबंधो की तलाश, एक नया विचार है क्योकि पारम्परिक रूप से kalaaon की भूमिका ज्यादातर अलंकरण व् उपयोगितामुलक ही रही है। ऐसे तथाकथित हौच- पौच में शिल्पा गुप्ता ने अपने इंस्टालेशन व् फोटोग्राफर के जरिये कला के बुनियादी मुद्दों पर एक बार फिरसे विचार करने का आग्रह किया है। अफ़सोस की बात है की इस विमर्श (डिस्कोर्स) में मात्र एलिट वर्ग द्वारा ही विचार होगा क्योकि यह वर्ग इसे जनता के बीच ले जाने के लिए अनुत्सुक है, क्योकि यह वर्ग मात्र वर्तमान को जीने और भोगने में विश्वास रखता है न की उस पर गंभीरता से, तर्क से, ज्ञान से सोचने व् विचार पर। इसलिए यहाँ जो भी अराजक है वह कलाओ के भविष्य के लिए niraasha के कर्तव्य मात्र है जिसे निभाने में नाभिनाल बद्ध लोग लगे हैं।
० विनय कुमार
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